मो.फारुक की रिपोर्ट 

बैकुंठपुर कोरिया। छत्तीसगढ़ के वन विभाग और प्रशासन की कार्यशैली पर अब सवाल उठने लगे हैं। मामला जिला बैकुंठपुर स्थित गुरु घासीदास तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व का है। कागजों में तो इस राष्ट्रीय उद्यान को टाइगर रिजर्व का दर्जा मिल चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि विभाग के पास अपने ही कार्यालय का बोर्ड बदलने तक की फुर्सत नहीं है।
​ साहब के पास ‘समय’ नहीं, विभाग के पास ‘बजट’ नहीं!

​हैरानी की बात यह है कि टाइगर रिजर्व के संचालक श्री सौरभ सिंह ठाकुर के पास शायद इस छोटे से सुधार के लिए समय का भारी अभाव है। चर्चा है कि विभाग के पास या तो इतना बजट नहीं है कि एक पेंटर बुलाकर बोर्ड ठीक करा सके, या फिर साहब को इस बदलाव की कोई खास परवाह नहीं है।

​ मुलाकात की कोशिशें नाकाम

​इस अव्यवस्था को लेकर जब जागरूक नागरिकों और प्रतिनिधियों ने संचालक महोदय से संपर्क करने की कोशिश की, तो वहां भी निराशा ही हाथ लगी। संचालक महोदय के पास इस विषय पर बात करने तक का समय नहीं है। सवाल यह उठता है कि:
​अगर एक बोर्ड सुधारने में महीनों लग रहे हैं, तो इतने बड़े टाइगर रिजर्व का प्रबंधन कैसे होता होगा?

​क्या विभाग को सरकार से मिलने वाले फंड में एक साइनबोर्ड पेंट कराने के पैसे नहीं मिलते?
​”सरकारी सुस्ती का आलम यह है कि जो संस्थान अब पूरे देश में ‘टाइगर रिजर्व’ के नाम से पहचाना जाना चाहिए, वह आज भी पुराने नाम की तख्ती लटकाए विभागीय उपेक्षा की कहानी बयां कर रहा है।”

​ जनता पूछ रही सवाल

​क्या यह महज एक तकनीकी भूल है या फिर वरिष्ठ अधिकारियों की तानाशाही? जब कार्यालय का मुख्य द्वार ही गलत जानकारी दे रहा हो, तो पर्यटकों और आम जनता के बीच विभाग की छवि क्या बनेगी? अब देखना यह है कि इस खबर के बाद साहब की नींद टूटती है या फिर ‘गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान’ का पुराना बोर्ड ही विभाग की पहचान बना रहेगा।

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